• कठपुतली चित्र

    राजस्थानी कठपुतली नृत्य कला प्रदर्शन

रविवार, 12 अप्रैल 2015

राजस्थान का प्रसिद्ध शक्तिपीठ जालौर की "सुंधामाता- (Sundha Mata)"

अरावली की पहाड़ियों में 1220 मीटर की ऊँचाई के सुंधा पहाड़ पर चामुंडा माता जी का एक प्रसिद्ध मंदिर स्थित है जिसे सुंधामाता के नाम से जाना जाता है। सुंधा पर्वत की रमणीक एवं सुरम्य घाटी में सागी नदी से लगभग 40-45 फीट ऊंची एक प्राचीन सुरंग से जुड़ी गुफा में अघटेश्वरी चामुंडा का यह पुनीत धाम युगों-युगों से सुशोभित माना जाता है। यह जिला मुख्यालय जालोर से 105 Km तथा भीनमाल कस्बे से 35 Km दूरी पर दाँतलावास गाँव के निकट स्थित है। यह स्थान रानीवाड़ा तहसील में मालवाड़ा और जसवंतपुरा के बीच में है। यहाँ गुजरात, राजस्थान और अन्य राज्यों से प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु पर्यटक माता के दर्शन हेतु आते हैं। यहाँ का वातावरण अत्यंत ही मोहक और आकर्षक है जिसे वर्ष भर चलते रहने वाले फव्वारे और भी सुंदर बनाते हैं।
माता के मंदिर में संगमरमर स्तंभों पर की गई कारीगरी आबू के दिलवाड़ा जैन मंदिरों के स्तंभों की याद दिलाती है। यहाँ एक बड़े प्रस्तर खंड पर बनी माता चामुंडा की सुंदर प्रतिमा अत्यंत दर्शनीय है। यहाँ माता के सिर की पूजा की जाती है। यह कहा जाता है कि चामुंडा जी का धड़ कोटड़ा में तथा चरण सुंदरला पाल (जालोर) में पूजित है। सुंधामाता को अघटेश्वरी कहा जाता है जिसका अभिप्राय है- "वह घट (धड़) रहित देवी, जिसका केवल सिर ही पूजा जाता है।"
पौराणिक मान्यता के अनुसार अपने ससुर राजा दक्ष से यहाँ यज्ञ के विध्वंस के बाद शिव ने यज्ञ वेदी में जले हुए अपनी पत्नी सती के शव को कंधे पर उठाकर तांडव नृत्य किया तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के टुकड़े टुकड़े कर छिन्न भिन्न कर दिया। उनके शरीर के अंग भिन्न-भिन्न स्थानों पर जहां जहां गिरे, वहाँ शक्ति पीठ स्थापित हो गए। यह माना जाता है कि सुंधा पर्वत पर सती का सिर गिरा जिससे वे 'अघटेश्वरी' के नाम से विख्यात है।
देवी के इस मंदिर परिसर में माता के सामने एक प्राचीन शिवलिंग भी प्रतिष्ठित है, जो 'भुर्भुवः स्ववेश्वर महादेव' (भूरेश्वर महादेव) के नाम से सेव्य है। इस प्रकार सुंधा पर्वत के अंचल में यहाँ शिव और शक्ति दोनों एक साथ प्रतिष्ठित है।
यहाँ प्राप्त सुंधा शिलालेख हरिशेन शिलालेख या महरौली शिलालेख की तरह ऐतिहासिक महत्व का है। इस शिलालेख के अनुसार जालोर के चौहान नरेश चाचिगदेव ने इस देवी के मंदिर में विक्रम संवत 1319 में मंडप बनवाया था जिससे स्पष्ट होता है कि इस सुगंधगिरी अथवा सौगन्धिक पर्वत पर चाचिगदेव से पहले ही यहाँ चामुंडा जी विराजमान थी तथा चामुंडा 'अघटेश्वरी' नाम से लोक प्रसिद्ध थी। सुंधा माता के विषय में एक जनश्रुति यह भी है कि बकासुर नामक राक्षस का वध करने के लिए चामुंडा अपनी सात शक्तियों (सप्त मातृकाओं) समेत यहाँ पर अवतरित हुई जिनकी मूर्तियाँ चामुंडा (सुंधा माता) के पार्श्व मे प्रतिष्ठित है। माता के इस स्थान का विशेष पौराणिक महत्व है, यहाँ आना अत्यंत पुण्य फलदायी माना जाता है। कई समुदायों/जातियों द्वारा इस परिसर में भोजन प्रसाद बनाने के लिए हॉल का निर्माण कराया गया है। नवरात्रि के दौरान यहाँ भारी तादाद में श्रद्धालु माता की अर्चना के लिए आते हैं। पर्वत चोटी पर स्थित मंदिर पर जाने में आसानी के लिए वर्तमान में 800 मीटर लंबे मार्ग वाला रोप-वे भी यहाँ संचालित है जिससे लगभग छः मिनट में पर्वत पर पहुँचा जा सकता है।



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म्हारे मरुधर देश रा प्यारा ढाणी-गाँव

(1)
म्हारे मरुधर देश रा प्यारा ढाणी-गाँव
म्हारे मरुधर देश रा प्यारा ढाणी-गाँव ।
कोरा कोरा मटका रो सोंधो - सोंधो पाणी।
गर्मी रा मौसम को कलेवो,छाछ -राबड़ी और धाणी
पीपल अर खेजडा री, ठंडी शीतळ छांव
म्हारे मरुधर देश रा प्यारा ढाणी-गाँव ।।
(2)
पावणा रो अठे होव मोकलो सत्कार
टाबर ,जिव -जिनवारा न हेत रो पुचकार
सीधा सांचा लोग अठा रा, त्योंहारा रो चाव
म्हारे मरुधर देश रा प्यारा ढाणी-गाँव ।।
(3)
केर कमटिया सांगरी का मेवा री सुवास
धर्म दान और वीरता रा मंड्या पड्या इतिहास
नर -नारयां रो अठे ,फुटरो बणाव्
म्हारे मरुधर देश रा प्यारा ढाणी-गाँव ।।
(4)
प्याऊ ठंडा पानी का, हेला रो हेत अठे
मीठी बोली ऱी अपणायत आ सोना जेड़ी रेत् कठे
दुबड़ी ऱी जड़ की तरियां, आपस रो जुडाव
म्हारे मरुधर देश रा प्यारा ढाणी-गाँव ।।

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राजस्थान के प्रमुख नगरो के उपनाम

अभ्रक की मण्डी - भीलवाड़ा
आदिवासीयो का शहर , सौ द्वीपों का शहर- बाँसवाड़ा 
राजस्थान का शिमला -माउंट आबू
अन्न का कटोरा - श्री गंगानगर
औजारो का शहर - नागौर
आइसलैण्ड आॅफ ग्लोरी - जयपुर
उध्यानो,बगीचो का शहर - कोटा
ऊन का घर - बीकानेर
ख्वाजा की नगरी - अजमेर
गलियो का शहर - जैसलमेर
गुलाबी नगरी - जयपुर
घंटियो का शहर - झालरापाटन
छोटी काशी - बुन्दी
जलमहलो की नगरी - डीग
झीलो की नगरी - उदयपुर
वस्त्र नगरी - भीलवाड़ा
देवताओं की उपनगरी - पुष्कर
नवाबो का शहर - टोंक
पूर्व का  पेरिस - जयपुर
पूर्व का वेनिस - उदयपुर
पहाड़ो की नगरी - डुंगरपुर
भक्ति व साधना की नगरी - मेड़तासिटी
मूर्तियो का खजाना - तिमनगढ़ , करौली
मरुस्थल की शोभा - रोहिड़ा
राजस्थान की मरुनगरी - बीकानेर
राजस्थान का ह्रदय - अजमेर
राजस्थान का प्रवेश द्धार - भरतपुर
राजस्थान का सिंह द्धार - अलवर
राजस्थान का अन्न भण्डार - गंगानगर
राजस्थान की स्वर्णनगरी - जैसलमेर
राजस्थान की शिक्षा की राजधानी - अजमेर
राजस्थान का कश्मीर - उदयपुर
राजस्थान का काउंटर मेग्नेट - अलवर 
राजस्थान की मरुगंगा - इन्दिरा गाँधी नहर
पश्चिम राजस्थान की गंगा - लुणी नदी
राजस्थान की मोनालीसा - बणी ठणी
रेगिस्तान का सागवान - रोहिड़ा
राजस्थान का खजुराहो - भण्डदेवरा
राजस्थान का कानपुर - कोटा
राजस्थान का नागपुर - झालावाड़
राजस्थान का राजकोट - लुणकरणसर
राजस्थान का स्कॉटलैण्ड -अलवर
राजस्थान की धातु नगरी - नागौर
राजस्थान का आधुनिक विकास तीर्थ - सूरतगढ़
राजस्थान का पँजाब - साँचौर
राजस्थान की अणुनगरी - रावतभाटा , बेगूँ 
राजस्थान का हरिद्धार - मातृकुण्डिया , चित्तौड़गढ़
राजस्थान का अण्डमान - जैसलमेर
राजपुताना की कूँची - अजमेर
राजस्थान का मेनचेस्टर - भीलवाङा
राजस्थान का जिब्राल्टर - तारागढ़ , अजमेर
राजस्थान का ताजमहल - जसवंतथड़ा , जोधपुर
राजस्थान का भुवनेश्वर - ओसियाँ
राजस्थान की साल्टसिटी - साँभर
राजस्थान की न्यायायिक राजधानी - जोधपुर
राजस्थान का चेरापूँजी - झालावाड़
राजस्थान की डल झील - माउण्ट आबू
राजस्थान का गौरव - चित्तौड़गढ़
मेवाङ का मैराथन-दिवेर
प्राचीन भारत का टाटानगर - रैढ ( टोंक)
             ऐसो मेरो राजस्थान।
             पधारो म्हारे देश ।।


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राजस्थान के प्रमुख अनुसंधान केन्द्रो के नाम

1. राष्ट्रीय सरसों अनुसंधान केन्द्र - सेवर जिला भरतपुर
2. केन्द्रीय सूखा क्षेत्र अनुसंधान संस्थान - CAZRI- जोधपुर
3. केन्द्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान - अविकानगर जिला टौंक
4. केन्द्रीय ऊँट अनुसंधान संस्थान - जोहड़बीड़, बीकानेर
5. अखिल भारतीय खजूर अनुसंधान केन्द्र - बीकानेर
6. राष्ट्रीय मरुबागवानी अनुसंधान केन्द्र - बीकानेर
7. राष्ट्रीय घोड़ा अनुसंधान केन्द्र - बीकानेर
8. सौर वेधशाला - उदयपुर
9. राजस्थान कृषि विपणन अनुसंधान संस्थान - जयपुर
10. केन्द्रीय पशुधन प्रजनन फार्म - सूरतगढ़ जिला गंगानगर
11. राजस्थान राजस्व अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान - अजमेर
12. राजस्थान राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान - उदयपुर
13. सुदूर संवेदन केन्द्र - जोधपुर
14. माणिक्यलाल वर्मा आदिम जाति शोध एवं सर्वेक्षण संस्थान - उदयपुर
15. राष्ट्रीय मसाला बीज अनुसंधान केन्द्र - अजमेर
16. राष्ट्रीय आयुर्वेद शोध संस्थान - जयपुर
17. केन्द्रीय इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियरिंग शोध संस्थान (सीरी) - पिलानी
18. अरबी फारसी शोध संस्थान - टौंक
19. राजकीय शूकर फार्म - अलवर
20. केन्द्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान - अविकानगर, मालपुरा टौंक
21. बकरी विकास एवं चारा उत्पादन परियोजना, स्विट्जरलैंड के सहयोग से - रामसर, अजमेर
22. केन्द्रीय ऊन विकास बोर्ड - जोधपुर
23. राज्य स्तरीय भेंस प्रजनन केन्द्र - वल्लभनगर उदयपुर
24. भेड़ रोग अनुसंधान प्रयोगशाला - जोधपुर
25. भेड़ एवं ऊन प्रशिक्षण संस्थान - जयपुर
26. शुष्क वन अनुसंधान संस्थान, जोधपुर { ARID FOREST RESEARCH INSTITUTE (AFRI)} ORGANISATION
प्रमुख गौवंश नस्ल अनुसंधान केन्द्र-
1. गिर - डग, झालावाड़
2. जर्सी गाय - बस्सी, जयपुर
3. मेवाती - अलवर
4. थारपारकर - सूरतगढ़, गंगानगर
5. हरियाणवी - कुम्हेर, भरतपुर
6. राठी - नोहर, हनुमानगढ़
7. नागौरी - नागौर
8. थारपारकर - चांदन, जैसलमेर
प्रमुख भेड़ नस्ल अनुसंधान केन्द्र-
1. बाँकलिया - नागौर
2. फतहपुर सीकर
3. चित्तौड़गढ़
4. जयपुर
राज्य के अश्व विकास केन्द्र-
1. बिलाड़ा, जोधपुर
2. सिवाना, बाड़मेर { मालानी घोड़ों के लिए }
3. मनोहरथाना, झालावाड़
4. बाली, पाली
5. जालोर
6. पाली
7. चित्तौड़
8. उदयपुर
9. जयपुर
10. बीकानेर

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रंग रंगीलो सबसे प्यारो म्हारो राजस्थान जी ।

रंग रंगीलो सबसे प्यारो म्हारो राजस्थान जी ।
माथे बोर, नाक में नथनी, नोसर हार गलै में जी,
झाला, झुमरी, टीडी भलको, हाथा में हथफूल जी।
टूसी, बिंदी, बोर, सांकली, कर्ण फूल कानामें जी,
कंदोरो, बाजूबंद सोवे, रुण-झुण बाजे पायल जी।
रंग रंगीलो सबसे प्यारो म्हारो राजस्थानजी ।
रसमलाई, राजभोग औ कलाकंद, खुरमाणी जी,
कतली, चमचम, चंद्रकला औ मीठी बालूशाही जी।
रसगुल्ला, गुलाब जामुन औ प्यारी खीर- जलेबी जी,
दाल चूरमो , घी और बाटी सगला रे मन भावे जी।
रंग रंगीलो सबसे प्यारो म्हारो राजस्थानजी ।
कांजी बड़ा दाल को सीरो, केर-सांगरी साग जी,
मोगर, पापड़, दही बड़ा औ नमकीन गट्टा भात जी।
तली ग्वारफली और पापड़, केरिया रो अचार जी,
घणे चाव से बणे रसोई, कर मनवार जिमावे जी।
रंग रंगीलो सबसे प्यारो म्हारो राजस्थान जी ।
काली ऊमटे जद, बोलण लागे मौर जी,
बिरखा के आवण री बेला, चिड़ी नहावे रेत जी।
खड़ी खेत के बीच मिजाजण , कजरी गावे जी,
बादीलो घर आसी कामण, मेडी उड़ावे काग जी।
रंग रंगीलो सबसे प्यारो म्हारो राजस्थान जी ।
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"POMCHA" - A Famous odhani of rajasthan (पोमचा - राजस्थान की एक प्रसिद्ध ओढ़नी)-Rajasthan Gk

"पोमचा" - राजस्थान की एक प्रसिद्ध ओढ़नी

◆ राजस्थान में स्त्रियों की ओढ़नियों मे तीन प्रकार की रंगाई होती है- पोमचा, लहरिया और चूंदड़।

◆ पोमचा पद्म या कमल से संबद्ध है, अर्थात इसमें कमल के फूल बने होते हैं। यह एक प्रकार की ओढ़नी है।

◆ वस्तुतः पोमचा का अर्थ कमल के फूलके अभिप्राय से युक्त ओढ़नी है। यह मुख्यतः दो प्रकार से बनता है- 1. लाल गुलाबी 2. लाल पीला। 


◆ इसकी जमीन पीली या गुलाबी हो सकती है।इन दोनो ही प्रकारों के पोमचो में चारो ओर का किनारा लाल होता है तथा इसमें लाल रंग से ही गोल फूल बने होते हैं। 

Pomcha
POMCHA पोमचा राजस्थान की एक ओढनी
◆ यह बच्चे के जन्म के अवसर पर पीहर पक्ष की ओर से बच्चे की मां को दिया जाता है।

सूर्य पूजन के समय बच्चे का नए वस्त्रों के साथ नवप्रसूता को मायके से भेजा गया  लिए विशेष परिधान  " पीला " पहनना आवश्यक होता है, जो उनके चेहरे की पीतवर्ण आभा को और अधिक सुवर्णमय बनाता है

◆ पीले अथवा नारंगी रंग की पृष्ठभूमि के साथ लाल बॉर्डर इस परिधान की विशेषता है। इस पर भी आरी तारी की कढ़ाई के साथ बेल बूटे होते हैं।जगमग बेल बूटों की  कढ़ाई के साथ लाल और पीले रंग में रंग पीला साडी या ओढ़नी पहनकर जच्चा जब गोद में बच्चे को लेकर पूजन करती है तो उसके चेहरे पर वात्सल्य की आभा और अभिमान की छटा देखते ही बनती है ! इसके बाद अन्य पूजन अथवा शुभ कार्यों में माएं चुन्दडी के स्थान पर पीले का प्रयोग भी करती हैं।

◆ पुत्र का जन्म होने पर पीला पोमचा तथा पुत्री के जन्म पर लाल पोमचा देने का रिवाज है। 

◆ पोमचा राजस्थान में लोकगीतों का भी विषय है।पुत्र के जन्म के अवसर पर "पीला पोमचा" का उल्लेख गीतों में आता है। एक गीत के बोल इस तरह है-
" भाभी पाणीड़े गई रे तलाव में, भाभी सुवा तो पंखो बादळ झुकरया जी।
     देवरभींजें तो भींजण दो ओदेवर और रंगावे म्हारी मायड़ली जी।।"

अर्थात देवरकहता है कि भाभी तुम पानी लेने जा रही हो परंतु घटाएं घिर रही है, तुम्हारा पीला भीग जाएगा, रंगचूने लगेगा। तब भाभी कहती है कि कोई बात नहीं देवर मेरी मां फिर से रंगवा देगी।

◆ एक अन्य गीत में नवप्रसूता अपने पति से पिला रंगवाने को कहती है-
पिळो रंगावो जी
पाँच मोहर को साहिबा पिळो रंगावो जी
हाथ बतीसी गज बीसी गाढा मारू जी
पिळो रंगावो जी

दिल्ली सहर से साईबा पोत मंगावो जी
जैपर का रंगरेज बुलावो गाढा मारू जी
पिळो रंगावो जी
◆ एक अन्य गीत में नवप्रसूता पत्नी अपने पति से पीला रंगवाने का अनुरोध करती है।
" बाईसा रा वीरा, पीलो धण नै केसरी रंगा दो जी।"


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सोमवार, 30 मार्च 2015

ऊँचा-ऊँचा धोरा अठै, लाम्बो रेगिस्तान।

ऊँचा-ऊँचा धोरा अठै, लाम्बो रेगिस्तान।
कोसां कोस रुंख कोनी, तपतो राजस्थान।।
फोगला अर कैर अठै, करै भौम पर राज।
गोडावणरा जोङा अठै, मरुधर रा ताज।।
कुंवा रो खारो पाणी, पीवै भैत मिनख।
मेह रो पालर पाणी, ब्होत जुगत सूं रख।।
कोरी कोरी टीबङी, उङै रेत असमान।
सणसणाट यूं बाज रही, जणुं सरगम रा गीत।।
सोनै ज्यूं चमके रेत, चाँदनी रातां में। रेत
री महिमा गावै, चारण आपरी बातां में।।
इटकण मिटकण दही चटोकण, खेलै बाल गोपाल अठै।
गुल्ली डंडा खेल प्यारा, कुरां कुरां और कठै।।
अरावली रा डोंगर ऊंचा, आबू शान मेवाङ री।
चम्बल घाटी तिस मिटावै, माही जान मारवाङ री।।
हवेलियाँ निरखो शेखावाटी री, जयपुर में हवामहल।
चित्तौङ रा दुर्ग निरखो, डीग रा निरखो जलमहल।।
संगमरमर बखान करै, भौम री सांची बात।
ऊजळै देश री ऊजळी माटी, परखी जांची बात।।
धोरा देखो थार रा, कोर निकळी धोरां री।
रेत चालै पाणी ज्यूं, पून चालै जोरां री।।
भूली चूकी मेह होवै, बाजरा ग्वार उपजावै।
मोठ मूँग पल्लै पङे तो, सगळा कांख बजावै।।
पुष्कर रो जग में नाम, मेहन्दीपुर भी नाम कमावै।
अजमेर आवै सगळा धर्मी, रुणेचा जातरु पैदल जावै।।
रोहिङै रा फूल भावै, रोहिङो खेतां री शान।
खेजङी सूँ याद आवै, अमृता बाई रो बलिदान।
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