• कठपुतली चित्र

    राजस्थानी कठपुतली नृत्य कला प्रदर्शन

मंगलवार, 14 अप्रैल 2015

परीक्षा मार्गदर्शन प्रश्नोत्तरी(भाग -1)

परीक्षा मार्गदर्शन प्रश्नोत्तरी-
1. राजस्थान का जिब्राल्टर दुर्ग किसे कहा जाता है?
(अ) लोहागढ़ को
(ब) तारागढ़ (अजयमेरु)को
(स) तिमनगढ़ को
(द) चित्तौड़गढ़ को
उत्तर- ब
2. बछबारस त्यौहार किस दिन मनाया जाता है?
(अ) चैत्र कृष्णा एकादशी को
(ब) भाद्रपद शुक्ल द्वादशी को
(स) भाद्रपद कृष्णा द्वादशी को
(द) आश्विन कृष्णा द्वादशी को
उत्तर- स
3. किस दुर्ग के बारे में अबुलफजलने कहा था- "यह दुर्ग पहाडियों के बीच है, इसीलिए कहते हैं कि बाकि दुर्ग तो नंगे है किन्तु यह बख्तरबंद किला है?
(अ) लोहागढ़
(ब) तारागढ़ (अजयमेरु)
(स) रणथम्भौर
(द) चित्तौड़गढ़
उत्तर- स
4. बाबू महाराज का मेला कहाँ भरता है?
(अ) अलवर
(ब) धौलपुर
(स) अजमेर
(द) चित्तौड़गढ़
उत्तर- ब
5. पिंजारा क्या है?
(अ) पालकी उठाने वाली जाति
(ब) एक वाद्य यंत्र
(स) विवाह की एक रस्म
(द) रुईधुनने वाली एक जाति
उत्तर- द
6. प्रसिद्ध व्यक्तित्व अतुल कनक है?
(अ) न्यायविद
(ब) राजस्थानी साहित्यकार
(स) लोक नर्तक
(द) लोक गायक
उत्तर- ब
7. प्रसिद्ध व्यक्तित्व अल्लाहजिलाई बाई सम्बंधित है?
(अ) ब्लू पॉटरी से
(ब) राजस्थानी साहित्य से
(स) लोक नृत्य से
(द) लोक गायन से
उत्तर- द
8. राजस्थान की प्रथम विधानसभा के अध्यक्ष कौन थे?
(अ) श्री लाल सिंह शक्तावत
(ब) श्री गिरिराज प्रसाद तिवाड़ी
(स) श्री नरोत्तम लाल जोशी
(द) श्री रामनारायण चौधरी
उत्तर- स
9. धावा डोली अभयारण किसके संरक्षण के लिए प्रसिद्ध है?
(अ) उड़न गिलहरी के
(ब) कृष्ण मृग के
(स) गोडावण के
(द) चिंकारा के
उत्तर- ब
10. बुड्डा जोहड़ का मेला प्रतिवर्ष किस जिले मेंभरता है?
(अ) अलवर में
(ब) धौलपुर में
(स) अजमेर में
(द) श्रीगंगानगर में
उत्तर- द
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राजस्थान के रिति रिवाज एवं प्रथाए (भाग-1)

आठवाँ पूजन
स्त्री के गर्भवती होने के सात माह पूरे कर लेती है तब इष्ट देव का पूजन किया जाता है और प्रीतिभोज किया जाता है। पनघट पूजन या जलमा पूजन बच्चे के जन्म के कुछ दिनों पश्चात (सवा माह बाद) पनघट पूजन या कुआँ पूजन की रस्म की जाती है इसे जलमा पूजन भी कहते हैं।
आख्या
बालक के जन्म के आठवें दिन बहने जच्चा को आख्या करती है और एक मांगलिक चिह्न 'साथिया' भेंट करती है।
जड़ूला उतारना
जब बालक दो या तीन वर्ष का हो जाता है तो उसके बाल उतराए जाते हैं। वस्तुतः मुंडन संस्कार को ही जडूला कहते हैं।
सगाई
वधू पक्ष की ओर से संबंध तय होने पर सामर्थ्य अनुसार शगुन के रुपयेतथा नारियल दिया जाता है।
बिनौरा
सगे संबंधी व गाँव के अन्य लोग अपने घरों में वर या वधू तथा उसके परिवार को बुला कर भोजन कराते हैं जिसे बिनौरा कहते हैं।
तोरण
तोरण
यह जब बारात लेकर कन्या के घर पहुँचता है तो घोड़ी पर बैठे हुए ही घर के दरवाजे पर बँधे हुए तोरण को तलवार से छूता है जिसे तोरण मारना कहते हैं। तोरण एक प्रकार का मांगलिक चिह्न है।
खेतपाल पूजन
राजस्थान में विवाह का कार्यक्रम आठ दस दिनों पूर्व ही प्रारंभ हो जाते हैं। विवाह से पूर्व गणपति स्थापना से पूर्व के रविवार को खेतपाल बावजी (क्षेत्रपाल लोकदेवता) की पूजा की जाती है।
कांकन डोरडा
विवाह से पूर्व गणपति स्थापना के समय तेल पूजन कर वर या वधू के दाएँ हाथ में मौली या लच्छा को बंट कर बनाया गया एक डोरा बाँधते हैं जिसे कांकन डोरडा कहते हैं। विवाह के बाद वर के घर में वर-वधू एक दूसरे के कांकन डोरडा खोलते हैं।
बान बैठना व पीठी करना
लग्नपत्र पहुँचने के बाद गणेश पूजन (कांकन डोरडा) पश्चात विवाह से पूर्व तक प्रतिदिन वर व वधू को अपने अपने घर में चौकी पर बैठा कर गेहूँ का आटा, बेसन में हल्दी व तेल मिला कर बने उबटन (पीठी) से बदन को मला जाता है, जिसको पीठी करना कहते हैं। इस समय सुहागन स्त्रियाँ मांगलिक गीत गाती है। इस रस्म को 'बान बैठना' कहते हैं।
बिन्दोली
विवाह से पूर्व के दिनों में वर व वधू को सजा धजा और घोड़ी पर बैठा कर गाँव में घुमाया जाता है जिसे बिन्दोली निकालना कहते हैं।
मोड़ बाँधना
विवाह के दिन सुहागिन स्त्रियाँ वर को नहला धुला कर सुसज्जित कर कुलदेवता के समक्ष चौकी पर बैठा कर उसकी पाग पर मोड़ (एक मुकुट) बांधती है।
बरी पड़ला
विवाह के समय बारात के साथ वर के घर से वधू को साड़ियाँ व अन्य कपड़े, आभूषण, मेवा, मिष्ठान आदि की भेंट वधू के घर पर जाकर दी जाती है जिसे पड़ला कहते हैं। इस भेंट किए गए कपड़ों को 'पड़ले का वेश' कहते हैं। फेरों के समय इन्हें पहना जाता है।
मारत
विवाह से एक दिन पूर्व घर में रतजगा होता है, देवी-देवताओं की पूजा होती है और मांगलिक गीत गाए जाते हैं। इस दिन परिजनों को भोजन भी करवाया जाता है। इसे मारत कहते हैं।
पहरावणी या रंगबरी
विवाह के पश्चात दूसरे दिन बारात विदा की जाती है। विदाई में वर सहित प्रत्येक बाराती को वधूपक्ष की ओर से पगड़ी बँधाई जाती है तथा यथा शक्ति नगद राशि दी जाती है। इसे पहरावणी कहा जाता है।
सामेला
जब बारात दुल्हन के गांव पहुंचती है तो वर पक्ष की ओर से नाई या ब्राह्मण आगे जाकर कन्यापक्ष को बारात के आने की सूचना देता है। कन्या पक्ष की ओर उसे नारियल एवं दक्षिणा दी जाती है। फिर वधू का पिता अपने सगे संबंधियों के साथ बारात का स्वागत करता है, स्वागत की यह क्रिया सामेला कहलाती है।
बढार
विवाह के अवसर पर दूसरे दिन दिया जाने वाला सामूहिक प्रीतिभोज बढार कहलाता है।
कुँवर कलेवा
सामेला के समय वधू पक्ष की ओर से वर व बारात के अल्पाहार के लिए सामग्री दी जाती है जिसे कुँवर कलेवा कहते हैं।
बींद गोठ
विवाह के दूसरे दिन संपूर्ण बारात के लोग वधू के घर से कुछ दूर कुएँ या तालाब पर जाकर स्थान इत्यादि करने के पश्चात अल्पाहार करते हैं जिसमें वर पक्ष की ओर से दिए गए कुँवर-कलेवे की सामग्री का प्रयोग करते है। इसे बींद गोठ कहते हैं।
मायरा
राजस्थान में मायरा भरना विवाह के समय की एक रस्म है। इसमें बहन अपनी पुत्री या पुत्र का विवाह करती है तो उसका भाई अपनी बहन को मायरा ओढ़ाता है जिसमें वह उसे कपड़े, आभूषण आदि बहुत सारी भेंट देता है एवं उसे गले लगाकर प्रेम स्वरुप चुनड़ी ओढ़ाता है। साथ ही उसके बहनोई एवं उसके अन्य परिजनों को भी कपड़े भेंट करता है।
डावरिया प्रथा
यह रिवाज अब समाप्त हो चुका है। इसमें राजा-महाराजा और जागीरदार अपनी पुत्री के विवाह में दहेज के साथ कुँवारी कन्याएं भी देते थे जो उम्र भर उसकी सेवा में रहती थी। इन्हें डावरिया कहा जाता था।
नाता प्रथा
कुछ जातियों में पत्नी अपने पति को छोड़ कर किसी अन्य पुरुषके साथ रह सकती है। इसे नाता करना कहते हैं। इसमें कोई औपचारिक रीति रिवाज नहीं करना पड़ता है। केवल आपसी सहमति ही होती है। विधवा औरतें भी नाता कर सकती है।
नांगल
नवनिर्मित गृहप्रवेश की रस्म को नांगल कहते हैं।
मौसर
किसी वृद्ध की मृत्यु होने पर परिजनों द्वारा उसकी आत्मा की शांति के लिए दिया जाने वाला मृत्युभोज मौसर कहलाता है।
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Description of the chief public dance of Rajasthan-राजस्थान के प्रमुख लोक नृत्यो का वर्णन

राजस्थान एक भौगोलिक एवं सांस्कृतिक विविधतायुक्त प्रदेश है । इसी विविधता ने इस प्रदेश के लोक नृत्यों को भी विविधता प्रदान की है और अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग नृत्य विकसित हुए । ये प्रमुख लोकनृत्य इस प्रकार हैं-

1. घूमर नृत्य -

यह पूरे राज्य में लोकप्रिय है तथा मांगलिक अवसरों व त्योहारों पर महिलाओं द्वारा किया जाता है। इसमें लहँगा पहने स्त्रियाँ गोल घेरे में लोकगीत गाती हुई नृत्य करती है । जब ये महिलाएँ विशिष्ट शैली में नाचती है तो उनके लहँगे का घेर एवं हाथों का संचालन अत्यंत आकर्षक होता है। लहंगे के घेर को कुंभ कहते है।

2. गैर नृत्य -

यह होली के दिनों में मेवाड़ एवं बाड़मेर में खेला जाता है। यह पुरुषों का नृत्य है । गोल घेरे में इसकी संरचना होने के कारण ही इसे 'गैर' कहा जाता है । इसमें पुरुषों की टोली हाथों में लंबी डंडियां ले कर ढोल व थाली-माँदल वाद्य की ताल पर वृत्ताकार घेरे में नृत्य करते हुए मंडल बनाते हैं । इस नृत्य में तेजी से पद संचालन और डंडियोँ की टकराहट से तलवारबाजी या पट्टयुद्ध का आभास होता है। मेवाड़ एवं बाड़मेर में गैर की मूल रचना समान है किंतु नृत्य की लय, ताल और मंडल में अंतर होता है।

3. अद्भुत कालबेलिया नृत्य-

"कालबेलिया" राजस्थान की एक अत्यंत प्रसिद्ध नृत्य शैली है। कालबेलिया सपेरा जाति को कहते हैं । अतः कालबेलिया सपेरा जाति का नृत्य है। इसमें गजब का लोच और गति होती है जो दर्शक को सम्मोहित कर देती है । यह नृत्य दो महिलाओं द्वारा किया जाता है। पुरुषनृत्य के दौरान बीन व ताल वाद्य बजाते हैं। इस नृत्य में कांच के टुकड़ों व जरी-गोटे से तैयार काले रंग की कुर्ती, लहंगा व चुनड़ी पहनकर सांप की तरह बल खाते हुए नृत्य की प्रस्तुति की जाती है। इस नृत्य के दौरान नृत्यांगनाओं द्वारा आंखों की पलक से अंगूठी उठाने, मुंह से पैसे उठाना, उल्टी चकरी खाना आदि कलाबाजियां दिखाई जाती है। केन्या की राजधानी नैरोबी में नवंबर, 2010 में हुई अंतरसरकारी समिति की बैठक में यूनेस्को ने कालबेलिया नृत्य को अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में भी शामिल किया है। इस नृत्य को विशेष पहचान नृत्यांगना 'गुलाबो' ने दिलाई, जिन्होंने देश में ही नहीं विदेशों में भी अपनी कलाकारी दिखाई।

4. शेखावटी का गींदड़ नृत्य-

शेखावटी का लोकप्रिय नृत्य है । यह विशेष तौर पर होली के अवसर पर किया जाता है। चुरु, झुंझुनूं , सीकर जिलों में इस नृत्य के सामूहिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं । नगाड़ा इस नृत्य का प्रमुख वाद्य है । नर्तक नगाड़े की ताल पर हाथों में डंडे ले कर उन्हें टकराते हुए नाचते हैं । नगाडे की गति बढ़ने के साथ यह नृत्य भी गति पकड़ता है । इस नृत्य में साधु, सेठ-सेठानी, दुल्हा-दुल्हन, शिकारी आदि विभिन्न प्रकार के स्वांग भी निकाले जाते हैं ।

5. मारवाड का डांडिया नृत्य-

मारवाड के इस लोकप्रिय नृत्य में भी गैर व गींदड़ नृत्यों की तरह डंडों को आपस में टकराते हुए नर्तन होता है तथा यह भी होली के अवसर पर पुरुषों द्वारा किया जाता है किन्तु पद संचालन, ताल-लय,गीतों और वेशभूषा की दृष्टि से ये पूर्णतया भिन्न हैं। इस नृत्य के समय नगाडा और शहनाई बजाई जाती है ।

6. कामड़ जाति का विशिष्ट तेरहताली नृत्य-

तेरहताली 
यह एक ऐसा नृत्य है जो बैठ कर किया जाता है । इस अत्यंत आकर्षक नृत्य में महिलाएँ अपने हाथ, पैरों व शरीर के 13 स्थानों पर मंजीरें बाँध लेती है तथा दोनों हाथों में बँधे मंजीरों को गीत की ताल व लय के साथ तेज गति से शरीर पर बँधे अन्य मंजीरो पर प्रहार करती हुई विभिन्न भाव-भंगिमाएं प्रदर्शित करती है। इस नृत्य के समय पुरुष तंदूरे की तान पर रामदेव जी के भजन गाते हैं ।

7. उदयपुर का भवई नृत्य-

चमत्कारिकता एवं करतब के लिए प्रसिद्ध यह नृत्य उदयपुर संभाग में अधिक प्रचलित है। नाचते हुए सिर पर एक के बाद एक, सात-आठ मटके रख कर थाली के किनारों पर नाचना, गिलासों पर नृत्य करना, नाचते हुए जमीन से मुँह से रुमाल उठाना, नुकीली कीलों पर नाचना आदि करतब इसमें दिखाए जाते हैं।

8. जसनाथी संप्रदाय का अग्नि नृत्य-

यह नृत्य जसनाथी संप्रदाय के लोगों द्वारा रात्रिकाल में धधकते अंगारों पर किया जाता है। नाचते हुए नर्तक कई बार अंगारों के ऊपर से गुजर जाता है। नाचते हुए ही वह अंगारों को हाथ में उठाता है तथा मुँह में भी डाल लेता है। यह नृत्य पुरुषों द्वारा ही किया जाता है।

9. जालोर का ढोल नृत्य-

जालोर के इस प्रसिद्ध नृत्य में 4 या 5 ढोल एक साथ बजाए जाते हैं । सबसे पहले समूह का मुखिया ढोल बजाता है। तब अलग अलग नर्तकों में से कोई हाथ में डंडे ले कर, कोई मुँह में तलवार ले कर तो कोई रूमाल लटका कर नृत्य करता है । यह नृत्य अक्सर विवाह के अवसर पर किया जाता है ।

10. चरी नृत्य-

राजस्थान के गाँवों में पानी की कमी होने के कारण महिलाओं को कई किलोमीटर तक सिर पर घड़ा (चरी) उठाए पानी भरने जाना पड़ता है । इस नृत्य में पानी भरने जाते समय के आल्हाद और घड़ोँ के सिर पर संतुलन बनाने की अभिव्यक्ति है। इस नृत्य में महिलाएँ सिर पर पीतल की चरी रख कर संतुलन बनाते हुए पैरों से थिरकते हुए हाथों से विभिन्न नृत्य मुद्राओं को प्रदर्शित करती है। नृत्य को अधिक आकर्षक बनाने के लिए घडे के ऊपर कपास से ज्वाला भी प्रदर्शित की जाती है ।

11. कठपुतली नृत्य-

इसमें विभिन्न महान लोक नायकों यथा महाराणा प्रताप, रामदेवजी, गोगाजी आदि की कथा अथवा अन्य विषय वस्तु को कठपुतलियों के माध्यम से प्रदर्शित किया जाता है। यह राजस्थान की अत्यंत लोकप्रिय लोककला है। यह उदयपुर में अधिक प्रचलित है।

12. गरासिया जनजाति का वालर नृत्य-

वालर गरासिया जनजाति का एक महत्वपूर्ण नृत्य है । यह घूमर नृत्य का एक प्रतिरूप है । इसमें माँदल, चंग व अन्य वाद्य यंत्रों की थाप पर नर्तक अपने कौशल का प्रदर्शन करते हुए थिरकते हैं।

13. चंग नृत्य -

पुरुषों के इस नृत्य में प्रत्येक पुरुषके हाथ में एक चंग होता है और वह चंग बजाता हुआ वृत्ताकार घेरे में नृत्य करता है। इस दौरान एक वादक बाँसुरी भी बजाता रहता और सभी होली के गीत व धमाल गाते हैं।

14. कच्छी घोड़ी नृत्य-

कच्छी घोड़ी नृत्य में ढाल और लम्बी तलवारों से लैस नर्तकों का ऊपरी भाग दूल्हे की पारम्परिक वेशभूषा में रहता है और निचले भाग में बाँस के ढाँचे पर कागज़ की लुगदी से बने घोड़े का ढाँचा होता है। यह ऐसा आभास देता है जैसे नर्तक घोड़े पर बैठा है। नर्तक, शादियों और उत्सवों पर नाचता है। इस नृत्य में एक या दो महिलाएँ भी इस घुड़सवार के साथ नृत्य करती है। कभी कभी दो नर्तक बर्छेबाज़ी के मुक़ाबले का प्रदर्शन भी करते हैं।

15. पनिहारी नृत्य-

पनिहारी का अर्थ होता है पानी भरने जाने वाली। पनिहारी नृत्य घूमर नृत्य के सदृश्य होता है। इसमें महिलाएँ सिर पर मिट्टी के घड़े रखकर हाथों एवं पैरों के संचालन के साथ नृत्य करती है। यह एक समूह नृत्य है और अक्सर उत्सव या त्योहार पर किया जाता है।

16. बमरसिया या बम नृत्य-

यह अलवर और भरतपुर क्षेत्र का नृत्य है और होली का नृत्य है। इसमें दो व्यक्ति एक नगाड़े को डंडों से बजाते हैं तथा अन्य वादक थाली, चिमटा, मंजीरा,ढोलक व खड़ताल आदि बजाते हैं और नर्तक रंग बिरंगे फूंदों एवं पंखों से बंधी लकड़ी को हाथों में लेकर उसे हवा में उछालते हैं। इस नृत्य के साथ होली के गीत और रसिया गाए जाते हैं । बम या नगाड़े के साथ रसिया गाने से ही इसे बमरसिया कहते हैं।

17. हाड़ौती का चकरी नृत्य-

यह नृत्य हाड़ौती अंचल (कोटा,बारां और बूंदी) की कंजर जाति की बालाओं द्वारा विभिन्न अवसरों विशेषकर विवाह के आयोजन पर किया जाता है। इसमें नर्तकी चक्कर पर चक्कर घूमती हुई नाचती है तो उसके घाघरे का लहराव देखते लायक होता है। लगभग पूरे नृत्य में कंजर बालाएं लट्टू की तरह घूर्णन करती है। इसी कारण इस नृत्य को चकरी नृत्य कहा जाता है। इस नृत्य में ढफ, मंजीरा तथा नगाड़े वाद्य का प्रयोग होता है।

18. लूर नृत्य-

मारवाड का यह नृत्य फाल्गुन माह में प्रारंभ हो कर होली दहन तक चलता है। यह महिलाओं का नृत्य है। महिलाएँ घर के कार्य से निवृत हो कर गाँव में नृत्य स्थल पर इकट्ठा होती है एवं उल्लास के साथ एक बड़े घेरे में नाचती हैं।

19. घुड़ला नृत्य-

यह मारवाड का नृत्य है जिसमें छेद वाले मटकी में दीपक रख कर स्त्रियाँ टोली बना कर पनिहारी या घूमर की तरह गोल घेरे में गीत गाती हुई नाचती है। इसमें धीमी चाल रखते हुए घुड़ले को नजाकत के साथ संभाला जाता है। इस नृत्य में ढोल, थाली, बाँसुरी, चंग, ढोलक, नौबत आदि मुख्य हैं। यह नृत्य मुख्यतः होली पर किया जाता है जिसमें चंग प्रमुख वाद्य होता है। इस समय गाया जाने वाला गीत है - "घुड़लो घूमै छः जी घूमै छः , घी घाल म्हारौ घुड़लो ॥"

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राजस्थान विधानसभा के इतिहास में जुडा एक नया अध्याय

राजस्थान विधानसभा के इतिहास में रविवार 22मार्च 2015 को एक नया अध्याय जुड गया ।यह मौका रहा जब विधानसभा का संचालन रविवार को हुआ।संसदीय कार्य मंत्री राजेंद्र राठौङ ने सदन की कार्रवाई शुरू होते ही कहा कि जनप्रतिनिधियों को छुट्टी देकर आपदा प्रभावित किसानो से मिलने का अवसर दिया,यह भी पहला मौका था। रविवार को विधानसभा सत्र के संचालन से फर्क भले न पडे , लेकिन एक संदेश गया कि विधानसभा जनता के हितो को सर्वोपरी मानते हुए सबसे पहले उस  कार्य को करना जरूरी मानती हैं। राठौङ ने कहा कि इससे पहले भी एक वह दिन था जब 14अगस्त1972 को आजादी की रजत जयंती पर एक मिनट के लिए रात 11 बजे विधानसभा आहूत की गई थी।एक अवसर आया 31 मार्च 2010 को यही विधानसभा रात को तीन बजकर चालीस मिनट पर स्थगित हुई थी । उस समय पूरे प्रदेश में अकाल ,पेयजल व बिजली पर चर्चा चली थी।
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रविवार, 12 अप्रैल 2015

Board of Secondary Education Rajasthan-BSER--माध्यमिक शिक्षा बोर्ड राजस्थान, अजमेर

Board of Secondary Education Rajasthan-BSER--माध्यमिक शिक्षा बोर्ड राजस्थान, अजमेर

इतिहास History-

माध्यमिक शिक्षा बोर्ड राजस्थान दिनांक 4 दिसम्बर 1957 को राजस्थान माध्यमिक शिक्षा अधिनियम 1957 के तहत जयपुर में स्थापित किया गया जिसे 1961 में अजमेर स्थानांतरित किया गया। सन् 1973 से यह जयपुर रोड़ स्थित अपनी वर्तमान बहुमंजिला इमारत में कार्यरत है। अपनी स्थापना से अब तक पाँच दशकों से यह देश के सबसे बड़े राज्य राजस्थान के छः हजार से अधिक विद्यालयों के माध्यमिक एवं उच्च माध्यमिक कक्षाओं के लाखों विद्यार्थियों की वार्षिक परीक्षाओं को संपादित करवा रहा है। बोर्ड द्वारा राज्य में एक सुदृढ़ परीक्षा तंत्र बनाने एवं परीक्षा सुधार करने के साथ साथ दूरदर्शिता का परिचय देते हुए माध्यमिक शिक्षा के विकास के लिए कई नवाचार भी किए गए हैं।

माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के प्रमुख कार्य-

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> माध्यमिक, प्रवेशिका, उच्च माध्यमिक तथा उपाध्याय स्तर की परीक्षाओं का आयोजन कर प्रमाण पत्र प्रदान करना। 
> राज्य में कक्षा 9 से 12 के लिए पाठ्यक्रम तथा पाठ्यपुस्तकों का निर्माण व प्रकाशन। 
> बोर्ड शिक्षण पत्रिका का प्रकाशन। 
> शिक्षकों के अकादमिक उन्नयन हेतु कार्यक्रमों का आयोजन।
> प्रतिभावान विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करने हेतु पुरस्कार, पदक एवं छात्रवृत्ति प्रदान करना तथा व्यक्तित्व विकास शिविर का आयोजन। 
> उत्कृष्ट परीक्षा परिणाम देने वाले विद्यालयों को शील्ड।
> विद्यार्थियों की बहुमुखी प्रतिभा को सँवारने और प्रोत्साहित करने के लिए प्रतियोगिताओं का आयोजन।
> विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग तथा माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के संयुक्त तत्वावधान में राज्य स्तरीय विज्ञान प्रतिभा खोज परीक्षा का आयोजन।
> राष्ट्रीय प्रतिभा खोज परीक्षा का आयोजन। 

बोर्ड का संगठन-

राजस्थान माध्यमिक शिक्षा अधिनियम 1957 के तहत बोर्ड की संरचना निम्नांकित है-

> अध्यक्ष -1
> उपाध्यक्ष सहित पदेन सदस्य - 7
> निर्वाचित सदस्य  - 7
> राज्य सरकार द्वारा मनोनीत सदस्य - 17
> विधानसभा अध्यक्ष द्वारा मनोनीत सदस्य -2
> सहवरण सदस्य s -2
*. बोर्ड अध्यक्ष की नियुक्ति राजस्थान सरकार द्वारा की जाती है। 
*. आयुक्त/निदेशक, माध्यमिक शिक्षा इसके उपाध्यक्ष तथा पदेन सदस्य होते हैं। 
*. बोर्ड का कार्यकाल तीन वर्ष होता है।
*. बोर्ड के सचिव की नियुक्ति राज्य सरकार द्वारा की जाती है। 
*. बोर्ड का समस्त कार्य बोर्ड के नियमों के अनुसार इसके कर्मचारियों तथा अधिकारियों द्वारा संपादित किया जाता है।

सम्पर्क सूत्र Contact-

परीक्षा परिणाम और अन्य विस्तृत जानकारी के लिए बोर्ड की वेबसाइट निम्न प्रकार से है-

http://rajeduboard.nic.in/



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तीर्थों का भांजा धौलपुर का प्रसिद्ध धार्मिक स्थल मचकुण्ड

मचकुंड
धार्मिक स्थल मचकुण्ड अत्यंत ही सुन्दर व रमणीक धार्मिक स्थल है जो प्रकृति की गोद में राजस्थान के धौलपुर नगर के निकट स्थित है। यहां एक पर्वत है जिसे गन्धमादन पर्वत कहा जाता है। इसी पर्वत पर मुचुकुन्द नाम की एक गुफा है। इस गुफा के बाहर एक बड़ा कुण्ड है जो मचकुण्ड के नाम से प्रसिद्ध है। इस विशाल एवं गहरे जलकुण्ड के चारों ओर अनेक छोटे-छोटे मंदिर तथा पूजागृह पाल राजाओं के काल (775 ई. से 915 ई. तक) के बने हुए है। यहां प्रतिवर्ष ऋषि पंचमी तथा भादों की देवछट को बहुत बड़ा मेला लगता है, जिसमें हजारों की संख्या में दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं। मचकुण्ड को सभी तीर्थों का भान्जा कहा जाता है। मचकुण्ड का उद्गम सूर्यवंशीय 24 वें "राजा मुचुकुन्द" द्वारा बताया जाता है। यहां ऐसी धारणा है कि इस कुण्ड में नहाने से पवित्र हो जाते हैं। यह भी माना जाता है कि मस्सों की बीमारी से त्रस्त व अन्य चर्म रोगों से परेशान लोग इस कुण्ड में स्नान करें तो वे इनसे छुटकारा पा जाते हैं। इसका वैज्ञानिक पक्ष यह है कि इस कुंड में बरसात के दिनों में जो पानी आकर इकट्ठा होता है उसमें गंधक व चर्म रोगों में उपयोगी अन्य रसायन होते हैं। यहाँ प्रत्येक माह की पूर्णिमा को आरती एवं दीपदान का आयोजन किया जाता है। मचकुंड का नाम सिक्ख धर्म से भी जुड़ा है। सिक्ख के गुरुगोविंद सिंह जी 4 मार्च 1662 को ग्वालियर जाते समय यहाँ ठहरे थे। यहाँ उन्होंने तलवार के एक ही वार से शेर का शिकार किया था। उनकी स्मृति में यहाँ शेर शिकार गुरुद्वारा बना है जिसका वैभव अत्यंत आकर्षक है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने कालयवन को राजा मुचुकुन्द के हाथों इसी स्थान पर मरवाया था। तभी से इसे मुचकुण्ड या मचकुण्ड पुकारा जाता है। पूरी कथा इस प्रकार है-
मचकुंड की कथा-
एक बार देवताओं और राक्षसों के बीच युद्ध हुआ तब राजा मुचुकुन्द की सहायता से देवताओं को विजयश्री प्राप्त हुई। लेकिन उस युद्ध में राजा का सब कुछ नष्ट हो चुका था तब राजा मुचुकुन्द ने देवताओं से अपने लिए गहरी नींद का वरदान मांगा। वरदान में निद्रा पाकर वे गन्धमादन पर्वत की गुफा में जाकर सो गए। मथुरा पर जब कालयवन ने घेरा डाला तब अस्त्रहीन होने की वजह से श्रीकृष्ण वहाँ से भाग निकले, भागते भागते उसी गुफा में जा घुसे जहां राजा मुचुकुन्द सो रहे थे। कालयवन भी उनका पीछा करते हुए उसी गुफा में आया एवं सोए हुए राजा को श्रीकृष्ण समझकर ठोकर मारी तो राजा मुचुकुन्द जाग गए। राजा मुचुकुन्द की दृष्टि कालयवन पर पड़ी जिससे वो भस्म हो गया। तब श्रीकृष्ण ने राजा को दर्शन दिए और उत्तराखण्ड जाकर तपस्या करने को कहा। राजा ने गुफा से बाहर आकर यज्ञ किया और उत्तराखण्ड चले गए। तभी से यह स्थान मचकुण्ड के नाम से प्रसिद्ध हो गया।
कमल के फूल का बाग-
मचकुंड तीर्थ के निकट ही कमल के फूल का बाग भी स्थित है। चट्टान काट कर बनाए गए कमल के फूल के आकार में बने हुए इस बाग का ऐतिहासिक दृष्टि से बड़ा महत्व है। प्रथम मुगल बादशाह बाबर की आत्मकथा 'तुजुके बाबरी' (बाबरनामा) में जिस कमल के फूल का वर्णन है वह यही कमल का फूल है। कमल के बाग के परिसर में स्नानागार बने हैं जो मुगलकालीन वास्तुकला के अनूठे साक्ष्य है।

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राजस्थान का प्रसिद्ध शक्तिपीठ जालौर की "सुंधामाता- (Sundha Mata)"

अरावली की पहाड़ियों में 1220 मीटर की ऊँचाई के सुंधा पहाड़ पर चामुंडा माता जी का एक प्रसिद्ध मंदिर स्थित है जिसे सुंधामाता के नाम से जाना जाता है। सुंधा पर्वत की रमणीक एवं सुरम्य घाटी में सागी नदी से लगभग 40-45 फीट ऊंची एक प्राचीन सुरंग से जुड़ी गुफा में अघटेश्वरी चामुंडा का यह पुनीत धाम युगों-युगों से सुशोभित माना जाता है। यह जिला मुख्यालय जालोर से 105 Km तथा भीनमाल कस्बे से 35 Km दूरी पर दाँतलावास गाँव के निकट स्थित है। यह स्थान रानीवाड़ा तहसील में मालवाड़ा और जसवंतपुरा के बीच में है। यहाँ गुजरात, राजस्थान और अन्य राज्यों से प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु पर्यटक माता के दर्शन हेतु आते हैं। यहाँ का वातावरण अत्यंत ही मोहक और आकर्षक है जिसे वर्ष भर चलते रहने वाले फव्वारे और भी सुंदर बनाते हैं।
माता के मंदिर में संगमरमर स्तंभों पर की गई कारीगरी आबू के दिलवाड़ा जैन मंदिरों के स्तंभों की याद दिलाती है। यहाँ एक बड़े प्रस्तर खंड पर बनी माता चामुंडा की सुंदर प्रतिमा अत्यंत दर्शनीय है। यहाँ माता के सिर की पूजा की जाती है। यह कहा जाता है कि चामुंडा जी का धड़ कोटड़ा में तथा चरण सुंदरला पाल (जालोर) में पूजित है। सुंधामाता को अघटेश्वरी कहा जाता है जिसका अभिप्राय है- "वह घट (धड़) रहित देवी, जिसका केवल सिर ही पूजा जाता है।"
पौराणिक मान्यता के अनुसार अपने ससुर राजा दक्ष से यहाँ यज्ञ के विध्वंस के बाद शिव ने यज्ञ वेदी में जले हुए अपनी पत्नी सती के शव को कंधे पर उठाकर तांडव नृत्य किया तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के टुकड़े टुकड़े कर छिन्न भिन्न कर दिया। उनके शरीर के अंग भिन्न-भिन्न स्थानों पर जहां जहां गिरे, वहाँ शक्ति पीठ स्थापित हो गए। यह माना जाता है कि सुंधा पर्वत पर सती का सिर गिरा जिससे वे 'अघटेश्वरी' के नाम से विख्यात है।
देवी के इस मंदिर परिसर में माता के सामने एक प्राचीन शिवलिंग भी प्रतिष्ठित है, जो 'भुर्भुवः स्ववेश्वर महादेव' (भूरेश्वर महादेव) के नाम से सेव्य है। इस प्रकार सुंधा पर्वत के अंचल में यहाँ शिव और शक्ति दोनों एक साथ प्रतिष्ठित है।
यहाँ प्राप्त सुंधा शिलालेख हरिशेन शिलालेख या महरौली शिलालेख की तरह ऐतिहासिक महत्व का है। इस शिलालेख के अनुसार जालोर के चौहान नरेश चाचिगदेव ने इस देवी के मंदिर में विक्रम संवत 1319 में मंडप बनवाया था जिससे स्पष्ट होता है कि इस सुगंधगिरी अथवा सौगन्धिक पर्वत पर चाचिगदेव से पहले ही यहाँ चामुंडा जी विराजमान थी तथा चामुंडा 'अघटेश्वरी' नाम से लोक प्रसिद्ध थी। सुंधा माता के विषय में एक जनश्रुति यह भी है कि बकासुर नामक राक्षस का वध करने के लिए चामुंडा अपनी सात शक्तियों (सप्त मातृकाओं) समेत यहाँ पर अवतरित हुई जिनकी मूर्तियाँ चामुंडा (सुंधा माता) के पार्श्व मे प्रतिष्ठित है। माता के इस स्थान का विशेष पौराणिक महत्व है, यहाँ आना अत्यंत पुण्य फलदायी माना जाता है। कई समुदायों/जातियों द्वारा इस परिसर में भोजन प्रसाद बनाने के लिए हॉल का निर्माण कराया गया है। नवरात्रि के दौरान यहाँ भारी तादाद में श्रद्धालु माता की अर्चना के लिए आते हैं। पर्वत चोटी पर स्थित मंदिर पर जाने में आसानी के लिए वर्तमान में 800 मीटर लंबे मार्ग वाला रोप-वे भी यहाँ संचालित है जिससे लगभग छः मिनट में पर्वत पर पहुँचा जा सकता है।



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